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मिलिये 22 साल के सत्यम से- पिता ने लोन लेकर बेटे को पढ़ाया और उसने पहले प्रयास में ही IAS बन इतिहास रच दिया

समस्तीपुर के दिघरा गांव के रहने वाले सत्यम गांधी ने 12वीं क्लास की पढ़ाई के बाद उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली का रूख किया.उनके पिता कृषि विवि में पौधारोपण विभाग में वरीय तकनीकी सहायक के पद पर कार्यरत हैं.मध्यमवर्गीय परिवार के लिए पढ़ाई का खर्च बहुत था लेकिन उनके पिता ने हार नहीं मानी और लोन लेकर बेटे को पढ़ाई कराई.पिता की कमाई का 40 फीसदी हिस्सा लोन चुकाने में चला जाता था.सत्यम भी उनकी उम्मीदों पर खरे उतरें.उन्होंने भी पहले अटेम्पट में आईएएस बनकर अपने पैरेंट्स के सपने को साकार किया.लोक सेवा आयोग परीक्षा में उनकी 10वीं रैंक आई है.संघ लोक सेवा आयोग के नतीजे 24 सितंबर, 2021 को जारी किए गए.फाइनल रिजल्ट में कुल 761 कैंडिडेट्स को चुना गया.संघ लोक सेवा आयोग में सिलेक्ट हुए 100 कैंडिडेट्स की सक्सेज जर्नी पर एक सीरीज चला रहा है.इसी कड़ी में हमने सत्यम गांधी से बातचीत की.

सत्यम गांधी जब गांव से निकलकर ग्रेजुएशन के लिए दिल्ली गए तो वह अपने लक्ष्य को लेकर बहुत स्पष्ट थे कि उन्हें क्या करना है.उन्होंने यह तय कर लिया था कि किसी भी कीमत पर अपना लक्ष्य हासिल करना है.कॉलेज के तीसरे वर्ष से ही उन्होंने अपनी तैयारी शुरू कर दी.उन्होंने सेलेबस को समझा, मैटेरियल का चुनाव किया और एक योजना बनाकर पढ़ाई में जुट गए.वह अपने लक्ष्य में सफल हो सकें.इसलिए उन्होंने शादी समारोह और गैर जरूरी फ्रेंड सर्किल समेत सोशल मीडिया से दूरी बनाई ताकि उनकी पढ़ाई में बाधा ना आ सके. सत्यम गांधी अगर आईएएस न होते तो क्या होते.इस सवाल के जवाब के जवाब में वह कहते हैं कि फिर से प्रयास करता उन्हें फिल्म मेकिंग.

 

सत्यम कहते हैं कि यूपीएससी की जर्नी काफी श्रमसाध्य और चुनौतीपूर्ण रही.वह खुद गांव के रहने वाले हैं. उनकी कक्षा एक से 12वीं तक की शिक्षा केंद्रीय विद्यालय पूसा से हुई.वर्ष 2017 में वह पहली बार ग्रेजुएशन करने दिल्ली गए.उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ दयाल सिंह कॉलेज से राजनीतिशास्त्र में वर्ष 2020 में स्नातक किया.शहर का कल्चर ग्रामीण इलाके के कल्चर से थोड़ा अलग होता है.उस माहौल भी वह ढलें.वह एक निर्णय लेकर गांव से निकले थे कि मुझे यह करना है और किसी हाल में बिना किए वापस नहीं लौटना है.इस सोच के साथ वह पढ़ाई में डटे रहे.उन्हें हमेशा पढ़ाई के लिए अपने परिवार के किए गए प्रयास याद आते थे.परिवार की उम्मीदें व सपने उनके जेहन में बसे थे.

उनके मम्मी-पापा ने उनके लिए काफी त्याग किए.उन्हें हमेशा पढ़ाने के लिए बैंक से कर्ज लिया.कर्ज लेकर ही पढ़ाई हुई.बहुत ही डेडिकेटेड और कंसिस्टेंस तरीके से पढ़ाई करना बहुत जरूरी है.उनके घर वालों का भी सपना था कि वह ऑफिसर बनें, डीएम बनें.उनका वह सपना अब पूरा हुआ है.उनका कहना है कि उनके जीवन में ऐसा कुछ खास स्ट्रगल नहीं रहा है पर थोड़ी बहुत आर्थिक समस्या रहती थी.इसलिए वह सेकेंड इयर में कॉलेज की पढ़ाई के साथ काम भी करते थे ताकि थोड़े बहुत पैसे कमा सकें.यही फाइनेंसियल स्ट्रगल रहा है.जब भी आपको ऐसा लगे कि यह हमसे नहीं हो पाएगा, तब यह जरूर सोचें कि हम यह क्यों कर रहे हैं और आपको यह चीज क्यों करनी है और फिर अपने मम्मी-पापा का चेहरा जरूर याद करें कि अगर नहीं होगा तो मम्मी-पापा ने जो त्याग किया है.

उसका क्या होगा.यह छोटी-छोटी चीजे हैं और आपका भी एक सपना है कि यह चीज मुझे क्यों करना है.इस हताशा निराशा का जर्नी का एक पार्ट समझेंगे तो आप डिमोटिवेड नहीं होंगे आप मोटिवेटेड होंगे.उनका कहना है कि मोटिवेशन हमेशा इनर होता है.यह अंदर से आता है.उसके लिए आप हमेशा यही सोचें कि आप जो कर रहे हैं, वह क्यों कर रहे हैं.यदि उस ‘क्यों’ का आपको जवाब मिल गया तो आप हमेशा मोटिवेटेड रहेंगे.यदि आप प्रेशर में कोई काम कर रहे हैं तो मोटिवेशन चला गया, तो एक मकसद बनाएं कि यह चीज क्यों कर रहे हैं तो मोटिवेशन कभी खत्म नहीं होगा.

सत्यम अपनी सफलता श्रेय अपने पिता अखिलेश कुमार और मां मंजू कुमारी को देते हैं.उनकी सफलता में दोस्तों व टीचर्स का भी अहम योगदान है.मां गृहिणी हैं.उनके दादा सच्चिदानन्द राय किसान हैं.उनका छोटा भाई शिवम गांधी चंडीगढ में बीपीएस की पढ़ाई कर रहा है.शिवम के ग्रेजुएशन का यह तीसरा वर्ष है.सत्यम ने अपनी यूपीएससी परीक्षा की तैयारी कॉलेज की पढ़ाई के तीसरे वर्ष से ही शुरू कर दी थी.बहरहाल सत्यम की सफलता के बाद परिवार खुश है.उनकी उम्मीद जगी है.उनका त्याग रंग लाया है.सत्यम कहते हैं कि उनके इंटरव्यू में अधिकतम सवाल उनके डैफ से पूछे गए थे.इंटरव्यू से पहले माइंड में यही चल रहा था कि यह जो कल इंटरव्यू का 30 मिनट होने वाला है.वह आपकी जिंदगी तय करेगा.

यह तीस मिनट काफी महत्वपूर्ण होने वाले हैं.मैंने यही सोचा था कि नेचुरल रहना है.घबराना नहीं है.नर्वस नहीं होना है.प्रार्थना भी कर रहा था कि इंटरव्यू अच्छा जाए.इंटरव्यू में आप यही सोचकर जाएं कि आप बात करने जा रहे हैं.आप यह नहीं सोचे की यह आपकी जिंदगी बनाएगा या बिगाड़ेगा.इसे बातचीत के तौर पर लें.खासकर डैफ में जितने कीवर्ड मेंशन हैं.उनके बारे में बारीकी से तैयारी करें.मॉक इंटरव्यू देना है ताकि आप अपने अंग्रेजी के स्तर को चेक कर सकें.मॉक और इंटरव्यू में जमीन आसमान का अंतर होता है.उनका इंटरव्यू करीब 20 मिनट तक चला था.

 

सत्यम गांधी कहते हैं जो भी कर रहे हैं.उसके लिए पूरी तरह एक योजना बनाइए और उसके मुताबिक करिए.अपना प्लान बार बार मत बदलिए लेकिन यदि आपको लगता है कि आपने पहले काफी एम्बीशियस प्लान बना लिया था तो आप उसे बदल सकते हैं.अपने सोर्सेज लिमिटेड रखिए और बार बार उनका रिवीजन करिए, यह जरूरी है.दस किताबों को एक बार बढ़ने के बजाए.दो किताबों को दस बार पढ़ना अच्छा रहेगा.आपको कंसिस्टेंस रहना है.हर दिन पढ़ना है.अपने टाइम को सही तरीके से मैनेज करना है.उसे वेस्ट नहीं करना है.डिस्ट्रैक्शन को एवाइड करें.सोशल मीडिया से अगर हो सके तो सीमित इंटरएक्शन बना कर रखें अन्यथा दूरी बना कर रखें.आम तौर पर आप सोशल मीडिया यूज कर सकते हैं लेकिन जब आप तैयारी कर रहे हैं.तो लिमिट कर दें, वरना टाइम बहुत वेस्ट होता है.

 

सत्यम का प्रशासनिक सेवा में आने का सपना बचपन से था.कॉलेज के फर्स्ट इयर में उन्होंने ग्रामीण विकास के क्षेत्र में जिला प्रशासन रांची के साथ कुछ काम किया था.वहां उन्होंने आब्जर्व किया कि यही एक प्लेटफार्म है, जहां पर जाकर वह सही से अपना कुछ योगदान दे सकते हैं.उनकी इसी प्रेरणा ने उनके लिए यूपीएससी तक का पथ प्रशस्त किया.सत्यम कहते हैं कि यूथ को सबसे पहले अच्छा इंसान बनना बहुत जरूरी है.जीवन के किसी क्षेत्र में अनुशासन और टाइम मैनेजमेंट लाना बहुत जरूरी होता है.जरूरी नहीं कि आप सरकारी नौकरी ही देखें आप बिजनेस और अन्य रोजगार के क्षेत्र में भी अच्छा कर सकते हैं.बस जो भी आप करें उसमें आप 100 प्रतिशत दें.

 

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