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सिर्फ माड़-भात खाकर पेट भरती थी अनीता, चिढ़ से गांव वाले जमीन पर कांच के टुकड़े बिखेर देते थे

झारखंड के रांची में चारी गांव की बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली अनीता कुमारी ने आगामी फीफा अंडर-17 विश्व कप टीम के लिए जमशेदपुर में राष्ट्रीय कोचिंग शिविर के लिए 33 की सूची में जगह बनाई है.लेकिन यह तक पहुँचाना अनीता कुमारी के लिए बिलकुल ही आसान नहीं था.फुटबॉल अपना करियर बनाने वाली अनिता कुमारी को इस खेल के लिए ताने मारे जाते थे.यहां तक की ट्रेनिंग सेशन के दौरान कांच के टुकड़े भी फेंके जाते थे.लेकिन तब भी अनीता ने हार नहीं मानी और वो ट्रेनिंग में डटी रही.

अनीता कुमारी की बहन विनीता ने कहा कि,मुझे गर्व है.उसने कई कठिनाइयों का सामना किया.हमारे पास खाने के लिए सिर्फ ‘माड भात’ था.वहीं, अनीता के माता-पिता आशा देवी और पूरन महतो कहते हैं,हम किसी तरह दोनों सिरों को पूरा करने का प्रबंधन करते हैं.यह बहुत अच्छा लग है कि उसे चुना गया है.एक गरीब बेटी प्रगति कर रही है.मुझे यह भी नहीं पता था कि लड़कियां फुटबॉल खेलती हैं, मैंने सोचा केवल लड़कों ने ऐ किया.यह सब भगवान के आशीर्वाद से है.

अनीता के चयन के बाद उसके कोच आनंद गोपले कहा कि,मैंने कई लड़कियों को प्रशिक्षित किया लेकिन अनीता में एक अलग उत्साह था.बहुत केंद्रित थी.मुझे बहुत गर्व महसूस होता है. अनीता जैसी कई और गरीब लड़कियां हैं.अगर झारखंड सरकार और खेल मंत्रालय का समर्थन है.. भारत को गौरवान्वित करने के लिए कई और अनीता तैयार हो जाएंगी.अनीता की मां आशा एक मजदूर है.उन्होंने बताया कि कैसे गांव वाले बार-बार उनके परिवार को उसे अपने फुटबॉल सपनों को पूरा न करने और पढ़ाई पर जोर देने के लिए कहा करते थे.

आशा के साथ हुई बातचीत में बताती हैं,अनीता पिछले 8 साल से खेल रही है.पूरे गांव को हैरानी होती कि वह इतना फुटबॉल क्यों खेल रही है. वे कहते थे कि उसे खेलने के बजाय पढ़ाई करनी चाहिए.लेकिन उसके लिए घर में रहने और सिर्फ घर का काम करने की तुलना में बाहर जाना और फुटबॉल खेलना बेहतर था.अनीता की छोटी बहन विनीता भी एक फुटबॉल खिलाड़ी है. वह याद करते हुए बताती हैं कि कैसे दोनों बहनों के फुटबॉल के प्रति जुनून को लेकर गांव वाले अक्सर उन पर गलत टिप्पणियां करते रहते थे.विनिता ने कहा,वे हमसे पूछते थे कि हम लड़कों की तरह ‘हाफ-पैंट’ क्यों पहन रहे हैं,हम फुटबॉल क्यों खेलते रहते हैं.और जब हम प्रैक्टिस के लिए जाते तो वे वहां कांच के टुकड़े या फिर जो भी कुछ मिलता हमारे ऊपर फेंक देते थे.

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