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भारत से विलुप्त हो चुकीं हैं कछुओं की 17 प्रजातियों के लिए छोड़ी सरकारी नौकरी,7 प्रजातियां बचाई शैलेन्द्र ने

आपके अंदर यदि कुछ करने का जज्बा होता है तो आपको देर से ही सही लेकिन मंजिल जरूर मिलती है.बस आपको अपने कार्य को लगने से करते रहना हैबाबा साहेब भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व शोधार्थी डा. शैलेंद्र सिंह ने कछुआ संरक्षण को लेकर अपनी मुहिम शुरू की जो अब उन्हें पुरस्कार के कतार में लगाकर खड़ा कर दिया है.उन्हें विलुप्त हो रहे कछुए की तीन प्रजातियों के संरक्षण के लिए ‘बहलर टर्टल कंजर्वेशन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है.

यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार कछुआ संरक्षण के क्षेत्र में दिया जाने वाला सबसे प्रतिष्ठित सम्मान है, इस क्षेत्र के नोबल पुरस्कार के तौर पर इसे देखा जाता है.उन्होंने विश्वविद्यालय से अपना शोध कार्य वर्ष 2013 में प्रो. राणा प्रताप सिंह के मार्गदर्शन में पूरा किया था.डा. सिंह और उनकी टीम के प्रयास से विलुप्त हो रहे कछुए की प्रजाति जैसे कि रेड-क्राउन रूफर्ड टर्टल (बटागुर कचुगा), नॉर्दर्न रिवर टेरापिन (बटागुर बस्का) और ब्लैक साफ़्टशेल टर्टल (निल्सोनिया निगरिकन्स) को संरक्षित कर उनके अस्तित्व को बचाने का सराहनीय कार्य किया है.अंतर्राष्ट्रीय कछुआ संरक्षण और जीव विज्ञान में उत्कृष्ट नेतृत्व, योगदान और उत्कृष्ट उपलब्धियों को पहचान प्रदान करने के लिए वर्ष 2006 से प्रदान किया जा रहा है.

आंबेडकर विश्वविद्यालय और नागपुर के राजीव गांधी नेशनल इंस्टीट्यूट अरफ इंटेलेक्चुअल प्रापर्टी मैनेजमेंट की ओर से मंगलवार को “बौद्धिक संपदा अधिकार” विषय पर वेबिनार हुआ.विवि के कुलपति प्रो.संजय सिंह के संरक्षण में आयोजित वेबिनार की मुख्य वक्ता पूजा विशाल मौलिकर ने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकार व्यक्तियों को उनके दिमाग की रचनाओं पर दिए गए अधिकार हैं.इसके अंतर्गत आमतौर पर आविष्कारक को एक निश्चित अवधि के लिए उसके आविष्कार के उपयोग पर एक विशेष अधिकार प्रदान किया जाता है.इसके अंतर्गत ट्रेडमार्क, पेटेंट, भौगोलिक संकेतक तथा औद्योगिक डिज़ाइन शामिल है.

 

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