कुछ हटकर

1 रुपये फीस लेकर 500 छात्रों को बनाया इंजीनियर, पहले पढाई फिर गुरु दक्षिणा, पढ़िए मैथ्स गुरु की पूरी कहानी

एक आम लड़के या यों कहें ऑटो चालक से गणितज्ञ बनने का सफर तय किया जो आगे चलकर एक इतिहास पुरुष बन जाएंगे ये किसे पता था.पर, ऐसा ही हुआ युवा गणितज्ञ आर के श्रीवास्तव के साथ.कल तक जो गांव की पगडंडियों तक सिमटे हुए थे वो एकदिन दुनिया के मानचित्र पर छा जाएंगे ये किसी को पता नहीं था.हम बात कर रहे हैं बिहार के रोहतास जिले के बिक्रमगंज के रहने वाले आर के श्रीवास्तव की, जो खुद मुफलिसी में जिंदगी को गुजारते हुए गरीब और असहाय स्टूडेंट्स को 1 रूपया गुरु दक्षिणा लेकर इंजीनियर बना रहे हैं.आर के श्रीवास्तव अबतक 540 स्टूडेंट्स को बना चुके है इंजीनियर और यह कारवां निरंतर जारी है.

जिंदगी के कई पहलुओं को बहुत करीब से आरके श्रीवास्तव को देखने का मौका मिला है.इन्होंने अपने जीवन में काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं.मगर किसी भी परिस्थिति से हार नहीं मानी और अपने लक्ष्य पर चलते हुए एक दिन अपने मुकाम को पाने में कामयाब हुए। राष्ट्रपति से सम्मानित हो चुके मैथमेटिक्स गुरु आरके श्रीवास्तव ने अपने घर को चलाने के लिए ऑटो रिक्शा तक चलाया. दरअसल, इनके घर की माली हालत बहुत बूरी थी.

बचपन में ही इनके पिता का निधन हो गया.बड़े भाई ने घर की जिम्मेदारी संभाल ली, तब आरके बहुत छोटे थे.जब बड़े हुए तो पढ़ाई करना और बड़े भाई जब थक हारकर आते थे तो आरके ऑटो लेकर सड़कों पर कमाने निकल जाते थे.घर कि स्थिति में थोड़ी सुधार होने लगी.मगर आरके ने अपनी पढ़ाई के आगे कभी हार नहीं मानी.जिस क्लास में पढ़ते थे उसी क्लास के लड़कों को मैथेमैटिक्स पढ़ाने लगे.जब आमदनी होने लगी तो परिवार चलाने में सहारा साबित हुई.श्रीवास्तव के बड़े भाई का असमय निधन मगर क्या बताउं होनी को कुछ और ही मंजूर था.

जब घर की जिम्मेदारी पटरी पर लौटने लगी तो आरके श्रीवास्तव के बड़े भाई का असमय निधन हो गया.घर पर विपत्ति का पहाड़ टूट गया.सारी उम्मीदों पर पल में पानी फिर गया.बिखरते परिवार पर जब नजर पड़ी आरके की तो उन्होंने हिम्मत बांधते हुए घर की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेकर आगे निकल पड़े.इस बूरे दौर में उनकी पढ़ाई ही इनके लिए वरदान साबित हुई.यहां से आरके श्रीवास्तव उभरकर निकले मैथेमैटिक्स गुरु के रुप में.

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