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गरीबी के चलते ट्रैफिक सिग्नल पर बैठकर फूल बेचा करती थी सरिता माली ,किस्मत ऐसी की चमकी अब अमेरिका में कर रही पढ़ाई

संसार में इतनी दौड़-धूप भरी है जिंदगी  जहां कठिनाइयां बढ़ती ही जा रही हैं और मंजिल तक पहुंचने के लिए संकरीड़े रास्ते पर चलना काफी कठिन होता जा रहा है. आज हम एक ऐसी ही लड़की की कहानी को लेकर आपसे वार्तालाप करेंगे जहां ट्रैफिक सिग्नल पर बच्ची फूल बेचा करती थी. गाड़ी के पीछे भागा करती थी. आज वह लड़की अमेरिका में पढ़ा रही है और अपने सपनों की उड़ान भरने में सफल रही है.


आपको बता दें इस लड़की का नाम सरिता माली है. इन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट फेसबुक पर पोस्ट के द्वारा भावुक कर देने वाली पोस्ट साझा की है. सरिता लिखती हैं, यह मेरी अपनी कहानी है मैं मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से हूं.लेकिन मेरा जन्म और मेरी परवरिश मुंबई में हुई.मैं भारत के जिस वंचित समाज से आई हूं वह भारत के करोड़ों लोगों की नियति है.

लेकिन आज यह एक सफल कहानी इसलिए बन गई है क्योंकि मैं यहां तक पहुंची हूं. जब आप किसी अंधकार में समाज में पैदा होते हैं तो उम्मीद कि वह मध्यम रोशनी जो दूर से रह रह कर आपके जीवन में टिमटिमाती रहती है वही आपका सहारा बनती है. मैं भी उसी टिमटिमाती हुई शिक्षा रूपी रोशनी के पीछे चल पड़ी.

 

मैं ऐसे समाज में पैदा हुई जहां भुखमरी, हिंसा, अपराध,गरीबी और व्यवस्था का अत्याचार हमारे जीवन का सामान्य हिस्सा था. हमें कीड़े मकोड़े के अतिरिक्त कुछ नहीं समझा जाता था. ऐसे समाज में मेरी उम्मीद थी मेरे माता पिता और मेरी पढ़ाई.

मुंबई की झोपड़पट्टी से जेएनवीयू का तक का सफर अब जेएनयू से अमेरिका का सफर मेरा अमेरिका के 2 विश्वविद्यालयों में चयन हुआ है.यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन. यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया को वरीयता दी है. मुझे इस यूनिवर्सिटी में मेरी मेरिट और अकादमिक रिकॉर्ड के आधार पर अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित लेखकों में से एक चांसलर फैलोशिप दी है.

आपको बता दें यह कहानी अविश्वसनीय लगेगी क्योंकि यह मेरी कहानी है. मेरी अपनी कहानी में मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से हूं.लेकिन मेरा जन्म और मेरी परवरिश मुंबई में हुई. मैं भारत के जिस वंचित समाज से आई हूं.वह भारत के करोड़ों लोगों की नियति है. लेकिन आज यह एक सफल कहानी इसलिए बन पाई है क्योंकि मैं यहां तक पहुंची हूं.

जब आप किसी अंधकार में समाज में पैदा होते हैं तो उम्मीद कि वह मध्यम रोशनी जो दूर से रह-रहकर आपके जीवन में टिमटिमाती रहती है. वही आपका सहारा बनती है मैं भी उसी टिमटिमाती हुई शिक्षा रूपी रोशनी के पीछे चल पड़ी.मैं उसी समाज में पैदा हुई. जहां भुखमरी,हिंसा, अपराध, गरीबी और व्यवस्था का अत्याचार हमारे जीवन का सामान्य हिस्सा था.हमें कीड़े मकोड़ों के अतिरिक्त कुछ नहीं समझा जाता था. ऐसी समाज में मेरी उम्मीद थी मेरे माता, पिता और मेरी पढ़ाई मेरे पिताजी मुंबई के सिग्नल पर खड़े होकर फूल बेजते हैं. मैं आज भी जब दिल्ली के सिग्नल पर गरीब बच्चों को गाड़ी के पीछे भागते हुए कुछ बेजते हुए देखती हु तो मुझे मेरा बचपन याद आ जाता है और मन में सवाल उठता है कि क्या यह बच्चे कभी पढ़ पाएंगे. इनका आने वाला भविष्य कैसा होगा. जब हम सब भाई बहन त्योहार पर पापा के साथ सड़क के किनारे बैठकर फूल बेचते थे.तब हम भी गाड़ी वालों के पीछे ऐसे ही फूल लेकर दौड़ते थे.पापा उस समय हमें समझाते थे कि हमारी पढ़ाई ही हमें इस श्राप से मुक्ति दिला सकती है अगर हम नहीं पड़ेंगे तो हमारा पूरा जीवन खुद को जिंदा रखने के लिए संघर्ष करने और भोजन की व्यवस्था करने में भी जाएगा हम इस देश और समाज को कुछ नहीं दे पाएंगे उनकी तरह अनपढ़ रह कर समाज में अपमानित होते रहेंगे मैं यह सब नहीं कहना चाहती हूं. लेकिन मैं यह भी नहीं चाहती कि सड़क किनारे फूल बेचते किसी बच्चे की उम्मीद टूटे. उसका हौसला खत्म हो.इसी भूक, अत्याचार,अपमान और आसपास होते अपराध को देखते हुए 2014 में मैं जेएनयू हिंदी साहित्य में मास्टर करने आई. वर्ष 2014 में 20 साल की उम्र में मैं जेएनयू मास्टर करने आई थी और अब यहां से M.A M. Phil की डिग्री लेकर इस वर्ष की PHD करने के बाद मुझे अमेरिका में दोबारा phd करने और वहां पर आने का अवसर मिला है. पढ़ाई को लेकर हमेशा मेरे भीतर एक जुनून रहा है. 20 वर्ष की उम्र में मैंने शोध की दुनिया में कदम रखा था.खुश हु की यह सफर आगे 7 वर्षों के लिए अनवरत जारी रहेगा. आपकी जानकारी के लिए बता दें सरिता माली की एक बड़ी बहन और दो भाई हैं. जो उनके दृढ़ निश्चय से काफी प्रेरित थे. उन्होंने भी ट्यूशन लेना शुरू कर दिया और अपनी पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं.अब अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं. अपने फेसबुक पोस्ट के अंत में उन्होंने अपने सभी शिक्षकों और आकाओं के नामों का भी उल्लेख किया है. जिन्होंने उनकी ऐसे कठिन सफर में सहायता की है.

 

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