कुछ हटकर

विधवा भाभी से इस बड़ी वजह के चलते देवर ने लिए सात फेरे ,अब हर तरफ हो रही तारीफ

दोस्तों जैसा की आप सब जानते है की भारत देश में सभी नारियों को देवी मन जाता है,आज भी अगर घर में किसी के लड़की का जन्म होता है तो यही बोलै जाता है की लष्मी आई है.माँ को भगवन का दर्जा मिला है,पत्नी को अर्धांग्नी का दर्जा मिला हुआ है,मगर इन सब के बावजूद हमारे भारत देश में कई रूढ़िवादी बातो के चलन के चलते देश में कई महिलाओ की जिंदगी ख़राब भी की है,

इसमें सबसे पहले सति प्रथा है इस प्रथा को हर भारतीय जानता है.भारत में कई समाज सुधारको ने अपने योगदान से कई कुप्रथाओ को मिटाया.4 दिसंबर 1829 से. तब ब्रिटिश इंडिया के गवर्नर जनरल, विल्यम बेंटिक हुआ करते थे. राजा राम मोहन रॉय और बाकी समाज सुधारकों की पहल पर बेंटिक ने एक क़ानून पास किया और सती प्रथा को गैर क़ानूनी बना दिया. क़ानून बना देने से स्त्रियों को जीने का हक़ तो मिला, लेकिन इज्जत से जीने का नहीं. औरतें सती ना भी होतीं, तो भी विधवा होकर जीना नर्क के समान ही था.

समाज से अलग-थलग कर दिए जाने के अलावा, उन्हें अंडरगारमेंट्स पहनने जैसी बेसिक ज़रूरतों से भी मुहाल रखा जाता था. विधवाओं की स्थिति का मुद्दा उठा, जब 1834 में भारत में पहले लॉ कमीशन की स्थापना हुई. जिसके तहत इंडियन पीनल कोड का ड्राफ़्ट तैयार किया गया. इस पर बहस के दौरान एक मेम्बर ने नोट किया कि IPC में एक क़ानून तैयार किया जा रहा था. जिसमें अबॉर्शन के लिए कठिन सजा का प्रावधान था. मेम्बर ने इस बाबत को कहा, ‘विधवा पुनर्विवाह पर विचार-विमर्श किए बिना, अबॉर्शन को गैर क़ानूनी बनाना बेतुकी बात है. चूंकि अधिकतर अबॉर्शन विधवाओं के ही होते हैं.

दोस्तों आज के योग में कई ऐसे युवा है जो इन रूढ़िवादियों से अलग हट कर सोचा करते है,इंसान की जिंदगी में शादी का अपना एक महत्व है. शादी को लेकर हर किसी के मन में एक अलग उत्साह होता है. अपनी शादी को यादगार बनाने के लिए कोई हेलीकॉप्टर से आता है तो कोई बैलगाड़ी से. लेकिन हम एक ऐसी शादी की बात कर रहे हैं जिसने लोगों के लिए एक मिसाल पेश की. दरअसल, महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में बड़े भाई की विधवा से देवर ने शादी रचाई, जिसकी चर्चा पूरे इलाके में हो रही है.जिले के वानखेड गांव में रहने वाले एक शख्स की बीमारी से मौत हो जाने के कारण उसकी पत्नी और दो बच्चों पर दुःखों का पहाड़ खड़ा हो गया था. यह देख मृतक के छोटे भाई हरिदास दामधर को परिजनों और रिश्तेदारों ने विधवा भाभी से शादी करने की बात कही. हरिदास ने भी समाज और दुनिया की परवाह ना करते हुए सबका मान रखा और वह अपनी भाभी से शादी रचाने तैयार हो गया.

विधवा भाभी की ओर से भी सकारात्मक जवाब मिलने के बाद इस शादी की तैयारियां की गईं. फिर धूमधाम से देवर और भाभी पति-पत्नी के रिश्ते में बंध गए. बारातियों ने भी इस आदर्श विवाह में शिरकत की और हरिदास दामधर द्वारा उठाए गए कदम की जी भर के तारीफ की. भाभी से विवाह रचाने को लेकर हरिदास दामधर ने कहा, मेरे भाई का निधन हुए डेढ़ साल पहले हो गया था. उनके 2 बच्चे हैं. मेरे माता-पिता ने निर्णय लिया और मुझसे कहा कि भाभी से शादी करो, जिससे उन्हें और बच्चों को सहारा मिल जाएगा. माता-पिता और दोस्तों द्वारा लिया गया फैसला मुझे सही लगा और मैंने सोचा कि इससे भाभी और बच्चों का ही भला होगा. इसलिए मैंने शादी के लिए हां कर दी. मैं अपने इस फैसले से बहुत खुश हूं

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