कुछ हटकर

अंग्रेजी में थी बेहद कमजोर उसके बाद भी ये लड़की बन गयी IAS अफसर ?पढ़े सुरभि की सक्सेस स्टोरी

अगर कोई चाहे तो सब कुछ कर सकता है,ऐसी चाहत की एक बेमिसाल जज्बे को आज हम आप को बताने जा रहे है मध्य प्रदेश की रहने वाली सुरभि गौतम की, जिन्‍होंने विषम परिस्थितियों को पार कर वर्ष 2016 में सिविल सर्विसेज में ऑल इंडिया 50वीं रैंक हासिल की.सतना के छोटे से गांव अमदरा में एक वकील-शिक्षिका दंपति के यहां सुरभि पैदा हुई.प्राथमिक शिक्षा के लिए परिवार के अन्य बच्चों की तरह सुरभि का दाखिला भी गांव के सरकारी स्कूल में हुआ.यह हिंदी माध्यम स्कूल था.सुरभि बचपन से ही पढ़ने में काफी तेज थी,लेकिन परिवार के ज्यादातर सदस्यों के लिए यह कोई खास बात नहीं थी.मध्य प्रदेश के स्कूलों में पांचवीं में भी बोर्ड परीक्षा होती है.

जब पांचवीं का परिणाम आया तो टीचर ने सुरभि को बुलाया और पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘आपको गणित में शत-प्रतिशत अंक मिले हैं.मैंने बोर्ड परीक्षा में आज तक किसी को सौ में सौ पाते नहीं देखा.आगे आप बहुत अच्छा करोगी.सुरभि के लिए ये जादुई शब्द थे, जो जिंदगी भर के लिए दिमाग में बस गए.इसके बाद सुरभि पढ़ाई के प्रति और गंभीर हो गईं.इसी बीच उनके जोड़ों में रह-रहकर दर्द उठने लगा था, पर वह उसे नजरअंदाज करती रहीं.धीरे-धीरे दर्द पूरे शरीर में फैल गया, और एक दिन वह बिस्तर से लग गईं.

सुरभि के शरीर में जब लगातार दर्द रहने लगा तो उनके माता-पिता सुरभि को लेकर जबलपुर गए.वहां विशेषज्ञ डॉक्टर ने कहा, सुरभि को ‘रूमैटिक फीवर’ है.यह बीमारी हृदय को नुकसान पहुंचाती है और कुछ मामलों में मृत्यु भी हो जाती है.यह सुनकर माता-पिता स्तब्ध थे.डॉक्टर ने सुरभि को हर 15 दिन पर पेनिसिलिन का इंजेक्शन लगाने की सलाह दी.गांव में कुशल डॉक्टर था नहीं, इसलिए हर 15वें दिन पर सुरभि को जबलपुर जाना पड़ता.पर कमजोर सेहत, अभावों के बीच भी सुरभि ने अपनी पढ़ाई से मुंह नहीं मोडा.

इस दौरान सुरभि गौतम ने एक साथ कई मोर्चे पर अपनी लड़ाई लड़ी.सुरभि को दसवीं बोर्ड में गणित के साथ विज्ञान में भी शत-प्रतिशत अंक मिले.उन्हें राज्य के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों में गिना गया.उस समय अखबारों में जो खबर छपी उसमें लिखा गया कि सुरभि कलेक्टर बनना चाहती हैं, जबकि सुरभि के मन में उस समय तक ऐसा कोई ख्याल नहीं था.हालांकि इन खबरों के कारण उनका झुकाव यूपीएससी की तरफ हो गया.12वीं में भी अच्छे मार्क्स आने के बाद उन्होंने एक स्टेट इंजीनियरिंग एंट्रेंस परीक्षा क्लियर की और भोपाल के एक इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन्स में एडमिशन लिया.सरकारी स्कूल में पढ़ाई के दौरान वह अपने स्कूल की सबसे बेस्‍ट स्टूडेंट थीं.

सुरभि जब स्कूल से निकलकर कॉलेज पहुंची तो वहां उनकी दुनिया बिल्‍कुल बदली हुई थी.वह एक हिंदी मीडियम की छात्रा रही थीं और यहां आने वाले ज्यादातर बच्चे इंग्लिश मीडियम से थे.ऐसे में वहां जाकर शुरुआत में वह हीन भावना की शिकार हो गईं.कल तक जो लड़की अपने स्कूल में पहली सीट पर बैठती थी.अब वह पीछे बैठने लगी थी. उसे इस बात का बुरा लग रहा था कि,कोई उस पर ध्यान भी नहीं देता.लेकिन सुरभि ने अपनी हीन-भावना से निकलकर खुद को एक बार फिर स्थापित करने का ठाना.उन्होंने अपनी इंग्लिश पर काम करना शुरू किया.

इंग्लिश लैंग्वेज से परेशान सुरभि ने अपनी इंग्लिश सुधारने के लिए खुद से अंग्रेजी में बात करना शुरू कर दिया.सुरभि प्रतिदिन कम से कम 10 वर्ड मीनिंग याद करती थी.सुरभि दीवारों पर वर्ड मीनिंग लिखती थी और उसे दिन में कई बार दोहराया करती थी.कहीं से भी सुने गए फ्रेज और शब्दों को वह याद करती और अपनी अंग्रेजी इम्प्रूव करने के लिए काम करती थी.सुरभि ने अंग्रेजी में सपने देखने शुरू कर दिए.उनके सपने में सब अंग्रेजी में बात किया करते थे.इस दौरान उनके दिमाग में इंग्लिश ने ऐसा असर किया कि वो खुद से इंग्लिश में ही बात करने लगी.

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