कुछ हटकर

सवाल: भारत के किस राज्य में पाकिस्तान नाम का गाँव है ?

भारत व पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव जग-जाहिर है.उड़ी में हुए आतंकी हमले व उसके बाद भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद दोनों देशों के बीच की कटुता फिर सुर्खियों में है.आपको जानकर हैरत होगी कि इस देश में भी एक ‘पाकिस्तान’ है, जहां लोगों के दिल में हिंदुस्तान बसता है.इस ‘पाकिस्तान’ में आतंक के लिए कोई जगह नहीं.खास बात यह भी है कि इस पाकिस्तान में एक भी मुसलमान नहीं रहता.जाहिर है, यहां एक भी मदरसा व मस्जिद नहीं है.भगवान राम की पूजा होती है.हम बात कर रहे हैं बिहार के पूर्णिया जिला अंतर्गत श्रीनगर प्रखंड के एक गांव की.सिंघिया पंचायत में बसे इस गांव ‘पाकिस्तान टोला’ का नाम कब और कैसे पड़ा, इस बाबत गांव के बुजुर्गों ने बताया कि भारत विभाजन के समय 1947 में यहां रहने वाले अल्पसंख्यक परिवार पाकिस्तान चले गए.इसके बाद गांव का नाम लोगों ने ‘पाकिस्तान टोला’ रख दिया.

गांव के नामकरण की दूसरी कहानी 1971 भारत-पाक युद्ध से जुड़ी है.कहा जाता है कि युद्ध के वक़्त पूर्वी पाकिस्तान से कुछ शरणार्थी यहां आए और उन्होंने एक टोला बसा लिया.इन शरणार्थियों ने टोला का नाम पाकिस्तान रखा.बांग्लादेश बनने के बाद वे फिर चले गए, लेकिन इलाके का नाम ‘पाकिस्तान टोला’ ही रह गया.कालांतर में यहां आदिवासी बसते गये.वर्तमान में गांव में संथालों के करीब तीन दर्जन परिवार रहते हैं.मुख्य धारा से कटे गांव की आबादी अशिक्षित है.इन लोगों को केवल अपने घर-परिवार व इलाके की फिक्र है.दो जून की रोटी के जुगाड़ व गांव-परिवार तक सिमटी इनकी जिंदगी में आतंकवाद व हिंसा के लिए कोई जगह नहीं.
पूर्णिया के इस ‘पाकिस्तान टोला’ की याद नेताओं को केवल चुनाव के समय आती है.

यहां करीब 170 वोटर हैं. ग्रामीण गोसा मुर्मु कहते हैं, ”नेता लोग वोट के समय वायदे करते हैं, लेकिन इससे क्या फासदा.हमारी झोपडि़यां देखिए.पानी, बिजली और सड़क भी नहीं. गांव विकास से कोसों दूर है.चार नदियों से घिरे इस गांव की हालत पहले टापू की तरह थी.करीब पांच साल पहले पुल बना तो अब लोग यहां आ-जा पाते हैं.एक कच्ची सड़क आवागमन का सहारा है.यहां स्कूल व अस्पताल भी नहीं हैं.गांव तक जाने वाली यह सड़क ऐसी है कि बैलगाड़ी को भी मुश्किल हो.शायद यही कारण है कि यहां नेता व अधिकारी नहीं आते.ऐसे में ग्रामीण जद्दू टुडु का सवाल मौजूं है कि लोग तो विकास चाहते हैं, लेकिन यह हो कैसे?पाकिस्तान टोला नाम तो है,लेकिन यहां मुसलमान आबादी नहीं है.जाहिर है कि गांव में मस्जिद व मदरसा नहीं है.

यहां के आदिवासी श्रीराम की पूजा करते हैं.इनका मुख्य त्योहार बंधना जनवरी में आता है.गांव के लोगों के अपने देवता (गोसाई) हैं, जिनकी पूजा के लिए सभी एक जगह इकट्ठा होते हैं.फिर नृत्य-संगीत का दौर चलता है. विकास की रोशनी से दूर यहां के भोले-भाले ग्रामीण आतंकवाद का नाम तक नहीं जानते वे उउ़ी में पाकिस्तान समर्थित हालिया आतंकी हमले तथा इसके बाद सेना द्वारा पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक से भी अनभिज्ञ हैं.गांव के बुजुर्ग सुफोल हांसदा को जब पाकिस्तान की करतूत के बारे में बताया गया तब उन्हें दुख पहुंचा.गांव के लोग समाज की मुख्य धारा से कटे हुए हैं.इनकी अपनी ही दुनिया है.लेकिन, जब कभी बाहरी दुनिया से संपर्क होता है, इन्हें गांव के नाम के कारण परेशानी होती है.ग्रामीणों के अनुसार उन्हें अपना पता बताने में कभी-कभी बड़ी परेशानी होती है.गांव के एक युवक ने अपना दर्द बयां किया.गांव के नाम के कारण दो साल से उसका रिश्ता टूट जा रहा है.बुजुर्गों ने भी बताया कि गांव के नाम के कारण शादी-व्याह में परेशानी होती है. अधिकांश रिश्ते तो गांव के नाम के कारण टूट जाते हैं। कोई अपने बेटे-बेटी का विवाह ‘पाकिस्तान’ मे करना नहीं चाहता.

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