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12 साल पहले लापता हुआ रामबहादुर पाकिस्तान की जेल में था बंद , घर लौटा तो मां गले से लिपट कर रोई

सरबजीत, कुलभूषण जाधव, ऐसे ही कुछ और गिने-चुने नाम…. ये वो भारतीय हैं जो सालों तक जासूसी के आरोप में पाकिस्तान की कैद में बंद रहे. यहां तक कि सरबजीत पर पाकिस्तानी कैदियों ने हमला कर दिया था और 2 मई 2013 को उन्हें मार दिया. जबकि कुलभूषण जाधव का केस आज भी इंटरनेशनल कोर्ट में चल रहा है. जाहिर है, पाकिस्तान हमेशा भारतीय कैदियों को लेकर प्रोपेगेंडा खड़ा करता रहा है और बमुश्किल दो या तीन मामले ही इतने बड़े हो पाते है कि उनकी चर्चा बड़े स्तर पर हो सके. इस वक्त पाकिस्तान की जेल में भारत के करीब 537 कैदी हैं. इनमें से 483 मछुआरे और 54 आम नागरिक हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि पाकिस्तान की जेलों में भारतीय कैदियों के साथ ‘नर्क’ जैसा व्यवहार किया जाता है. यहां तक कि इन कैदियों को कानूनी मदद भी मुहैया नहीं कराई जाती.

भारतीय कैदियों से ‘नर्क’ जैसा व्यवहार

पाकिस्तान उन देशों में आता है जहां की जेलें किसी नर्क से कम नहीं होतीं. थर्ड डिग्री टॉर्चर, दिल दहला देने वाली सजा, जबरिया काम, धर्म परिवर्तन करने या पाकिस्तान के लिए जासूसी करने को मजबूर करना, यहां तक कि छोटी-छोटी बात पर हत्या यहां की जेल में आम बात है. इन यातनाओं को सह न पाने से कई कैदी तो पागल तक हो जाते हैं. कई बार तो पाकिस्तानी अदालत से मिली सजा दस से पंद्रह साल पहले खत्म हो जाती है लेकिन ऐसे हालात में भी कैदी बनकर ही रहना पड़ता है. पाकिस्तानी अधिकारी भारतीय कैदियों के साथ जानवरों जैसा सलूक करते हैं.

पाकिस्तान की लाहौर जेल से 12 साल बाद रिहा होकर बृहस्पतिवार को गांव पहुंचा रामबहादुर अपनों को नहीं पहचान सका, लेकिन धूमिल यादों से पहचानने की कोशिश करता रहा.मां कुसुमा और पिता गिल्ला ने गले लगाकर जब बेटा कहा तो भावुक हो गया.मां-पिता और पुत्र के मिलन को देखकर मौजूद लोग भी भावुक हो गए.बाद में पिता ने उसे सबसे परिचित कराया.पचोखर गांव निवासी रामबहादुर 15 साल की उम्र में लापता हो गया था.लगभग 12 साल लाहौर जेल में कैद रहा.करीब एक सप्ताह पूर्व उसे लाहौर जेल से रिहा कर भारत भेज दिया गया.

अमृतसर प्रशासन ने उसे कब्जे में ले लिया और अस्पताल में भर्ती कर इलाज कराया.रामबहादुर की पूरी जानकारी जुटाई. सत्यापन के बाद अमृतसर प्रशासन ने घर जाने की अनुमति दी.रामबहादुर को लेने के लिए बबेरू नायब तहसीलदार अभिनव तिवारी और अतर्रा थाने के दरोगा सुधीर चौरसिया अमृतसर गए और ट्रेन से कानपुर आए और फिर बोलेरो से गांव पहुंच.

पिता के बयान लेने के बाद प्रशासन ने रामबहादुर को परिजनों के सुपुर्द कर दिया.वह कुर्ता-पायजामा में खाली हाथ आया था, लेकिन सालों बाद घर पहुंचा रामबहादुर माता-पिता व अन्य किसी भी परिजन को नहीं पहचान सका.सभी को एकटक देखता रहा.छोटे भाई मैकू ने उसके पैर छुए.पिता ने गले लगाया और मां कुसुमा ने तिलक लगा मिठाई खिलाई.तब रामबहादुर ने पिता, मां और अन्य बड़े-बुजुर्गों के पैर छुए.रामबहादुर को देखने बड़ी संख्या में ग्रामीण भी उसके घर में जुटे थे.

भारतीय कैदी को मिलते हैं कानूनी अधिकार

इस मामले में एडवोकेट विराग गुप्ता कहते हैं कि पाकिस्तान या विदेश में भारतीय कैदियों का मसला बहुत जटिल है. जाधव जैसे चर्चिच मामलों में सरकार द्वारा साल्वे जैसे वरिष्ठ अधिवक्ता की मदद दी जाती है, पर बाकी गरीब कैदी गुमनाम बने रहते हैं. उनके परिजन भी इस लायक नहीं रहते कि वे विदेश में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ सकें. विराग गुप्ता बताते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के मुताबिक हर कैदी को परिजनों से मिलने की इजाजत होती है, लेकिन ज्यादातर मामलों में ऐसा नहीं हो पाता. यहां तक कि अगर परिजन न जा पाएं तो भारतीय उच्चायोग को यह भूमिका निभानी होती है. अगर किसी कैदी को अपने बलबूते पर कानूनी सेवा नहीं मिल पाती तो उन्हें मुफ्त कानूनी सहायता का प्रावधान है. लेकिन ज्यादातर मामलों में ये सेवा सिस्टम की शिकार हो जाती है. पाकिस्तान में भारतीय कैदियों के लिए ऐसे कई कानूनी प्रावधान हैं लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था संविधान और कानून से नहीं चलती, लिहाजा पाकिस्तान में सालोंसाल भारतीय कैदी बंद रहते हैं. अंतर्राष्ट्रीय रिवाज के अनुसार मृत्युदण्ड के कैदियों को कानूनी सहायता मुहैया कराना जरूरी है, जिसके बगैर उन्हें सजा नहीं दी जा सकती.

भारत ने की है पहल

विराग गुप्ता कहते हैं कि भारत में भी कई बार कैदियों को कानूनी सहायता न मिलने की दिक्कत आती है लेकिन भारत में कैदियों को सहायता देने के लिए राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और नाल्सा जैसी संस्थायें बनाई गई हैं. भारत में कानूनी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने दो दिन पहले एक मोबाइल एप जारी किया है जिससे जरुरतमंदों को हजारों वकीलों से संपर्क हो जाएगा जो उनके मामलों की निःशुल्क या प्रोबोनो मदद करेंगे.

होती है ज्यूडिशियरी कमिटी

पाकिस्तान में बंद भारतीय कैदियों की रिहाई के लिए एक ज्यूडिशियरी कमिटी भी होती है, जो समय-समय पर पाकिस्तान जाकर उन भारतीय कैदियों के बारे में रिव्यू करती है जो अपनी सजा पूरी कर चुके हैं.

 

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