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सिमरन बन सकती थी इंजीनियर, अपने पसंद का आखिरी खाना खाकर बन गयी साध्वी

इस संसार में बहुत से ऐसे लोग होते हैं जो अपने फायदे के लिए पीछे भागते ही रहते हैं और उनको पूरा करने में ही जीवन भर प्रयत्न करते रहते हैं. हमारा भारत देश अपने धार्मिक संस्कृति के कारण काफी ज्यादा प्रसिद्ध है. बहुत से वयक्तियों में धार्मिक आस्था है और हमारी भारतीय संस्कृति के कारण भी वह बहुत अधिक धार्मिक हो चुके हैं. ऐसा ही एक मामला सामने आया है जहां पर एक लड़की ने अपना सांसारिक जीवन त्याग करने का निर्णय लिया और अपना सांसारिक जीवन भी तियाग दिया.हम इस मामले पर चर्चा करेंगे और हम इतना ही कह सकते हैं जिसके भाग्य में जो लिखा होता है उसे वही मिलता है आइए तो हम चर्चा करते हैं क्या है पूरा मामला.


हम बात कर रहे हैं सिमरा जो एक जैन परिवार से है सिमरन ने पढ़ाई कर ली ग्रेजुएशन किया फिर नौकरी करने की भी सोच ली. ये लड़की ने एक सम्पन्न परिवार से भी है.पूरे जीवन में कोई कमी भी नहीं सब  सुख सुविधाओं के बावजूद भी सब कुछ छोड़कर सिर्फ भगवान की शरण मे जाने का निर्णय लेलिया और अध्यात्म गृहण कर लिया.

 

आपको बता दें यह मामला इंदौर से सामने आया है जहां पर बास्केटबॉल कॉन्प्लेक्स में मुमुशु सिमरन जैन का दीक्षा महोत्सव हुआ सिमरन की उम्र केवल 23 वर्ष है और भगवान की शरण में जाने का संसारिक सुखो को त्याग कर साध्वी जीवन जीने का फैसला ले लिया.सिमरन की दीक्षांत समारोह श्री वर्धमान श्वेतांबर स्थानकवासी जैन श्रावकसंघ ट्रस्ट के तत्वावधान में हुआ. दीक्षा लेने से पहले सिमरन ने अपना पूरा दिन घर वालों के साथ बिताया हाथों में मेहंदी लगाई सोलह सिंगार कीए और फिर अपनी पसंद का खाना खाया.


दीक्षा लेने से पहले सिमरन ने सारी सांसारिक वस्तुओं को त्याग दिया सबसे पहले उन्होंने अपने सभी सेवर अपनी मां को दे दिए. फिर अपने बालों का भी त्याग कर दिया. दीक्षा से पहले सिमरन ने कहा सांसारिक बुआ डॉक्टर मुक्तश्री की राह पर ही आत्मिक सुकून और परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है. इसलिए वैराग्य धारण कर रही हू.

सिमरन ने अपना साध्वी जीवन जीने के लिए कहां की मैं देशभर के खूबसूरत स्थानों पर घूमी और वहां वक्त बिताया लेकिन मुझे सुकून नहीं मिला सिमरन ने कहा जब मैं गुरुजनों के सानिध्य में आई तब जाकर सुकून की प्राप्ति हुई. मुझे चकाचौंध भरी जिंदगी रास नहीं आई. यहां लोग आवश्यकता से अधिक इस्तेमाल करते हैं जो उचित नहीं है. हमारे संत कम से कम संसाधनों में जीवन व्यतीत करते हैं. अधिक से अधिक पाने की बजाय आत्मा का परमात्मा से जुड़ना ही असली सुख है”

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