Breaking News
Home / कुछ हटकर / कमजोर महिलाओं के लिए किसी फरिश्तों से कम नहीं है ये डॉक्टर दम्पत्ति ,सड़कों पर भटक रहीं 500 की बचाई है जान

कमजोर महिलाओं के लिए किसी फरिश्तों से कम नहीं है ये डॉक्टर दम्पत्ति ,सड़कों पर भटक रहीं 500 की बचाई है जान

होम केयर फॉर द एल्डरलीः कॉल टु एक्शन’ नामक इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वरिष्ठ नागरिकों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है,जिनमें से अधिकांश खराब सेहत,उपेक्षा और दुर्व्यवहार का शिकार हैं और बदहाली में जीवन गुजारने के लिए मजबूर हैं.नागरिकों के पुनर्वास और कल्याण के लिए काम करने वाले एक एनजीओ हेल्पएज इंडिया ने बुजुर्गों को घर से निकाल देने और उनकी बदहाली के बारे में एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की थी.

बेंगलुरु के एक अन्य संगठन नाइटिंगेल्स मेडिकल ट्रस्ट ने पाया कि शहर के नागरिक निकाय के अनुमानित 25,000 बेघर लोगों में से 7500 बुजुर्ग महिलाएं थीं,जिन्हें उनके बच्चों ने घर से निकाल दिया था.यह केवल संख्या नहीं है, बल्कि सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ दी गई जिंदगियां हैं.यह एक ऐसा विचार था,जिसने अहमदाबाद के डॉक्टर दम्पत्ति को झंकझोर कर रख दिया। वे ऐसे बुजुर्गों की मदद करने और अपने स्तर पर कुछ करने के लिए आगे आए.

डॉक्टर राजेंद्र धमाने और डॉ सुचेता धमाने ने अहमदाबाद के काकासाहेब महस्के होम्योपेथिक मेडिकल कॉलेज से साल 1998 में डिग्री ली थी.इसके बाद उन्होंने अपना क्लीनिक खोला और समाज के लिए कुछ करने का फैसला लिया.उन्होंने तय किया कि वे नियमित तौर पर मरीजों की देखभाल तो करेंगे ही साथ ही फ्री हेल्थ चेकअप कैंप लगाएंगे और गरीब व बेघर लोगों को खाना भी खिलाएंगे.

डॉ राजेंद्र ने बताया,हम हमेशा से समाज के लिए कुछ करना चाहते थे.साल 2000 में हमने सड़क पर रह रहे बेसहारा लोगों की मदद करने का फैसला किया.सेवा करते हुए उस दौरान हमें कई ऐसे बुजुर्ग मिले, जिनके परिवार ने उन्हें घर से निकाल दिया था.उनमें से ज्यादातर की मानसिक हालत ठीक नहीं थी.वे अपने खाने तक का भी इंतजाम नहीं कर पा रहे थे.इस समस्या को उन्होंने काफी गंभीरता से लिया.दोनों ने मिलकर उसी साल मौली सेवा प्रतिष्ठान की शुरुआत की.उनके एनजीओ का लक्ष्य एक दिन में लगभग 90 बेघर लोगों को खाना खिलाना था.लेकिन 2007 में एक घटना ने उनके काम करने की दिशा को बदल दिया.

40 साल के राजेंद्र कहते हैं,मैं क्लीनिक जा रहा था.रास्ते में एक बेसहारा महिला को कूड़ेदान से निकाल कर बचा-कुचा खाना और गंदगी खाते हुए देखा.उसकी इस हालत से मुझे बहुत दुख हुआ.मैंने अपना टिफिन उसकी ओर बढ़ा दिया.उस पल में सब कुछ बदल गया था.घर आकर राजेंद्र ने इस बारे में अपनी पत्नी से बात की और काफी सोचने-विचारने के बाद उन्हें लगा कि जरूरतमंदों को सिर्फ खाना खिलाना ही काफी नहीं है। अब इससे आगे भी जाना होगा। वे बेसहारा लोगों को एक सुरक्षित स्थान देने के बारे में सोच रहे थे.

बेघर बुजुर्गों की समस्या जैसी दिखाई देती है,उससे कहीं ज्यादा बद्तर है.डॉ सुचिता ने बताया,मानसिक रूप से बीमार जिन महिलाओं को घर से निकाल दिया जाता है। उन्हें मदद की ज्यादा जरूरत होती है.बेघर लोगों को खाना खिलाते समय,अक्सर कई महिलाओं ने अपनी सुरक्षा और बलात्कार की बातें मुझसे साझा की थीं, जिसकी कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती.

वे आगे कहती हैं,जिन महिलाओं की दीमागी हालत ठीक नहीं है,वे ज्यादा असुरक्षित हैं.अगर वह अपने साथ हुए बलात्कार के बारे में किसी को बताती हैं या फिर पुलिस में इसकी रिपोर्ट करना भी चाहें,तो उन पर कोई विश्वास नहीं करता.ऐसे लोगों से बचने के लिए वह अक्सर रात में सड़क के डिवाइडर या गली के किनारों पर सोती हैं.ऐसी ही एक बुजुर्ग पीड़ित महिला ने बताया,कुछ साल पहले दो लोगों ने मेरे साथ बलात्कार किया था.जब मैंने उनसे पुलिस में रिपोर्ट करने की बात कही,तो उन्होंने मुझे जान से मारने की धमकी दी.मेरे परिवार में कोई भी जिंदा नहीं बचा है.मेरा बेटा भी मर गया,मुझे इस केंद्र में अपना नया घर मिला है.

कई मामलों में तो आर्थिक स्थिति ठीक होने के बावजूद, परिवार वाले मानसिक रूप से बीमार महिला या रिश्तेदारों को घर से निकाल, सड़क पर मरने के लिए छोड़ देते हैं.डॉ सुचेता कहती हैं,मानसिक बीमारी का इलाज भी अन्य बीमारियों की तरह किया जाना चाहिए.समय पर इलाज मिल जाए, तो हालात ज्यादा नहीं बिगड़ते। हमारा उद्देश्य सड़क पर बेसहारा महिलाओं की मदद करना और ऐसी किसी भी संभावित घटनाओं को होने से रोकना है.

About Anant Kumar

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *